September 18, 2020

रेडियो जिसने 8 लाख लोगो की जान ले ली।

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फोटो : सौजन्य AP NEWS

आज नेताओ के भाषण, मीडिया का विशलेषण और लोगो का मौन एक सामाजिक ढांचे को जन्म दे रहा है जहाँ हम प्रजातंत्र को भुल कर एक पागल भीड़ मे बदलते जा रहे है। एक भीड़ जो ऊकसाये जाने पर, कभी भी, कुछ भी कर सकती है।बहुत से लोग ये कहेगे की ये मनगढ़ंत बातें है और परिस्थितियों को बड़ा चढ़ा के प्रस्तुत किया जाता है। क्या सच मे ऐसा है या इतिहास मे ऐसा होने के उदाहरण है?प्रत्यक्ष रूप से कहे तो रुस, जर्मनी, अमेरिका और बाकी तमाम देशो मे ऐसे कई उदाहरण है। पर सबसे हाल का और सबसे भयानक उदाहरण है वो ” रवांडा रेडियो” जिसने 8 लाख लोगो की जान ले ली।

हम शायद इसे इस लिए भी भुल गये है क्योंकि ये अमेरिका या यूरोप मे नहीं हुआ। शायद इस लिये भी कि लोग चाहे सीधे तौर पर ना माने पर दुनिया का रवैया अफ्रीका की तरफ हमेशा से ही ” वी डोन्ट केयर” जैसा रहा है।खैर ये 1994 की बात है और कहानी है रवांडा की। आज से 26 साल पहले रवांडा इस बात का साक्षी बना कि क्या होता है जब सरकार और मीडिया दो समुदायो को एक दुसरे के विरुद्ध खड़ा कर देती है। आज से 26 साल पहले रवांडा ने वो खौफनाक मजंर देखा था जब “हुतु” समुदाय के लोगो ने “तुतसी” समुदाय के लोगो के घरों पर धावा बोला था। “हुतु” समुदाय की फौज तलवारो, बरछियों और ख्नंजरो के साथ ” तुतसियों ” पर टुट पड़ी।

फोटो : सौजन्य AP NEWS

पर ये हिंसा यूँ ही नही हुई। इसका मुख्य व निर्णायक कारण था वो RTLM रेडियो स्टेशन जो कई महिनो से “हुतु” समुदाय को “तुतसी” समुदाय के खिलाफ भड़का रही थी। कई सरकार के मंत्रियों के साथ सांठगांठ होने की वजह से ये रेडियो स्टेशन से होने वाले प्रसारण बहुत ही ज्यादा भड़काऊ और हिसंक होते थे।


इन भड़काऊ भाषणो मे लागातार “तुतसियो” के लिए “काकरोच” और “सांप” जैसे शब्दो का प्रयोग होता था। जो सरकारी अधिकारी इस नरसंहार को प्रायोजित करना चाहते थे वो “हुतुओं” को अपने पड़ोसी “तुतसियों” के खिलाफ उनकी शारीरिक बनावट को ले कर भड़काने लगे। “तुतसी” आमतौर पर “हुतुओं” से लम्बे कद के हुआ करते है तो “लम्बे पेड़ों को काट डालो” जैसे वाक्य जनता के बीच मे आम होने लगे।

फोटो : सौजन्य AP NEWS

इन सब चीजों का असर यह हुआ कि शहरी केंद्रो मे भी “Interahamwe militia” और सरकारी सेनाओ ने रोडब्लॉक लगा कर, तुतसियों को चुन चुन कर मारना शुरू कर दिया। सड़कों के किनारे तुतसियों की बिखरी पड़ी लाशों से भरने लगे। तुतसियों की पहचान उस national identification cards से कि जाने लगी जो 1962 मे बेल्जियम से आजादी मिलने के बाद जारी किये गये थे।


ये खौफनाक सिलसिला कुछ ऐसा चला कि अगले 100 दिनों मे लगभग 8 लाख लोगों का कत्ल हुआ जिसमे अधिकांश तुतसी थे। ऐसी नारकीय परिस्थितियां इतिहास मे भी कम ही हुई है जहाँ “हेट स्पिच” से शुरू हुआ सिलसिला एक इतने बड़े नरसंहार मे बदल गया।

फोटो : सौजन्य AP NEWS

पर ये अमानवीय परिस्थितियां कुछ महिनों के रेडियो से नही फैली थी बल्कि ये कई दशको से फैलाई गई घृणा और हीन भावना का नतीजा था। ठीक भारत की तरह वहाँ भी जब कभी सरकार को अपनी कुर्सी खतरे मे दिखती थी वह “एंटी तुतसी” कार्ड खेल देती थी। 1992 आते आते “हुतु” समुदाय उस पागल भीड़ मे बदल चुकी थी जो बस एक ईशारे पर कत्लेआम करने को तैयार थी। इस भीड़ को बस एक चिंगारी की जरुरत थी जो उन्हे रूलिंग पार्टी के नेता लिऑन मुगेसेरा द्वारा दिये गये खुनी आहवान से मिल गयी। इस आहवान मे उन्होने खुले तौर पर “तुतसियो” को मार कर लाशो को नदी मे फेंकने कि बात की थी।


रवांडा का अपना एक आधिकारिक रेडियो स्टेशन होने के बावजुद “हुतु” कट्टरवादियों ने RTLM रेडियो स्टेशन को जबरन बस नफरत और कट्टरवादी सोच को फ़ैलाने के लिए बसाया। क्या आज के अधिकांश प्रचार और प्रसार माध्यम भी कुछ ऐसा ही नही कर रहे?

जैसा कि ऐडोल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने कहा था, ” प्रोपैगेंडा का उद्देश्य बस सफलता पाना होता है। प्रोपैगेंडा का समझदारी और सुझबुझ से कोई लेना-देना नही होता।”


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